कभी नफरत से कभी दोस्ती से कभी प्यार से हारा हूँ,
मगर जब भी हारा हूँ बड़े हिसाब से हारा हूं,
मै काटो से नही हारा मुझे कलियां जख्म दे गयी,
जो फूल लगाई दिल मे उस गुलाब हारा हूँ.
फर्क कुछ नही पड़ा उसे मेरे न होने का,
मै तो उसके दूर जाने वाले ख्वाब से हारा हूँ.
कमीनी ये दूनिया के मुखौटे बहुत निकले,
वही चेहरे पर न दिखने वाले नकाब से हारा हूँ.
आज, कल, परसो सुन कर ही बीत गये दिन,
उसके लौट कर आने के इन्तजार से हारा हूँ.
अब कुछ नही बचा “सुशील, याद के सिवा,
जीत जीत कर हारा हार हार कर हारा हूँ…!!

